Friday, 7 November 2014

The Siberian crane – Migratory bird

The Siberian crane – Migratory bird 

The Siberian Crane is a very distinctive member of the crane family with regards to their structure, home ground and behavior. The Siberian Crane is characterized by white plumage, red or pale yellow eyes, reddish pink toes or legs. The face and sides of the head are brick red in colour and they do not have any feathers. It is very difficult to distinguish between the male and the female. The point of distinction is that the former is larger in size and have longer beaks. They are omnivorous and eat fishes and insects as well. The Siberian Cranes nest in western Siberia and migrate to India. The migration route stretches for 4000 miles. The Siberian Crane is presently an endangered species. Larger numbers of birds have been hunted over the years. 

The Siberian crane / Siberian white crane or the snow crane, is a  distinctive among the cranes, adults are nearly all snowy white, except for their black primary feathers that are visible in flight and with two breeding populations in the Arctic tundra of western and eastern Russia. The eastern populations migrate during winter to China while the western population winters in Iran and formerly, in India. Among the cranes, they make the longest distance migrations. Their populations, particularly those in the western range, have declined drastically in the 20th century due to hunting along their migration routes and habitat degradation.

Adults of both sexes have a pure white plumage except for the black primaries, alula and primary coverts. The forecrown, face and side of head is bare and brick red, the bill is dark and the legs are pinkish. The iris is yellowish. Juveniles are feathered on the face and the plumage is dingy brown. There are no elongated tertial feathers as in some other crane species. During breeding season, both the male and female cranes are often seen with mud streaking their feathers. They dip their beaks in mud and smear it on their feathers. The call is very different from the trumpeting of most cranes and is a goose-like high pitched whistling toyoya. They typically weigh 4.9–8.6 kg (10.8–19 lbs) and stand about 140 cm (55 in) tall. The wingspan is 210–230 cm (83–91 in) and length is 115–127 cm (45–50 in). Males are on average larger than females. There is a single record of an outsized male of this species weighing 15 kg (33 lb). The breeding area of the Siberian crane formerly extended between the Urals and Ob river south to the Ishim and Tobol rivers and east to the Kolyma region. The populations declined with changes in land use, the draining of wetlands for agricultural expansion and hunting on their migration routes.
These cranes feed mainly on plants although they are omnivorous. In the summer grounds they feed on a range of plants including the roots of hellebore (Veratrum misae), seeds of Empetrum nigrum as well as small rodents (lemmings and voles), earthworms and fish. They were earlier thought to be predominantly fish eating on the basis of the serrated edge to their bill, but later studies suggest that they take animal prey mainly when the vegetation is covered by snow. 

They also swallow pebbles and grit to aid in crushing food in their crop. 
These snow cranes return to the Arctic tundra around the end of April and beginning of May. The nest is usually on the edge of lake in boggy ground and is usually surrounded by water. Most eggs are laid in the first week of June when the tundra is snow free. The usual clutch is two eggs, which are incubated by the female after the second egg is laid. The male stands guard nearby. The eggs hatch in about 27 to 29 days. The young birds fledge in about 80 days. Usually only a single chick survives due to aggression between young birds. The population increase per year is less than 10%, the lowest recruitment rate among cranes. Their success in breeding may further be hampered by disturbance from reindeer and sometimes dogs that accompany reindeer herders. Captive breeding was achieved by the International Crane Foundation at Baraboo after numerous failed attempts. Males often killed their mates and captive breeding was achieved by artificial insemination and the hatching of eggs by other crane species such as the Sandhill and using floodlights to simulate the longer daylengths of the Arctic summer.

The status of this crane is critical and the world population is estimated to be around 3200–4000, nearly all of them belonging to the eastern breeding population. Of the 15 crane species this is the most threatened. Historic records from India suggest a wider winter distribution in the past including records from Gujarat, near New Delhi and even as far east as Bihar.

Tuesday, 28 October 2014

(18) माँ ज्वाला देवी ज्वालामुखी शक्तिपीठ

(18) माँ ज्वाला देवी ज्वालामुखी शक्तिपीठ 

माँ ज्वाला शक्तिपीठ कांगड़ा घाटी का प्रसिद्ध मंदिर है । इस स्थान पर माँ सती की ‘‘जीभ’’ गिरी थी और मूर्तियों सिद्धीदा के रूप में देवी मां (अबिका) और अनमाता भैरव के रूप में भगवान शिव हैं । ये लपटे देवी ज्वाला माँ के विभिन्न रूपों की अभिव्यक्ति के रूप में पूजा की जाती है । 

नौ लपटे देवी के नाम पर रखा गया है: महाकाली, मां अन्नपूर्णा, मां चंडी, मां हिंगलाज, विन्ध्यवासिनी, महालक्ष्मी, महा सरस्वती, मां अम्बिका और अंजना देवी लगातार किसी भी ईंधन या सहायता के बिना जल ,एक चटटान से निकलती देखी जा सकती है । सती की जीभ गिरने के स्थान पर ज्वालाजी मंदिर आज स्थित है । सती की जीभ सदा से जल रही पवित्र ज्वाला (पवित्र लौ ) इसका प्रतिनिधित्व करती है ।

 सम्राट अकबर ने आग बुझाने के लिए कई प्रयास किए लेकिन हर बार असफल रहा और अंत में वह भी अलौकिक शक्ति को स्वीकार कर लिया । पांडवों ने इस पवित्र पीठ की खोज की । माता ज्वाला देवी की पूजा अर्चना 3 तरीके से यानि पंचोपचाल, दसोपचाल और सोसोपचाल मुख्य रूप से कर रहे हैं और इसी प्रकार 5 अलग ज्वालाजी आरती माता ज्वाला जी में की जाती हैं । 1. श्रंगार आरती - यह ब्रहमा मुहुरत में सुबह होती है इस आरती में मालपुआ, खोआ, और मिश्री मंा ज्वाला के दरबार में भोग के लिए पेश की जाती है । 2. मंगल आरती - पहली आरती के आंधे घंटे
के अंतर पर की जाती है ।

 इस आरती में पीले चावल और दही मां भगवती को अर्पण किये जाते हैं । 3. मध्यांन काल आरती - यह दोपहर मध्यान काल में की जाती है । इस आरती में चावल, सतरंस दल और मिठाई पेष की जाती है । 4. सांयः काल आरती  - यह आरती सांयः को की जाती है । इस आरती में पूरी, चना और हलवा अर्पण किया जाता है । 5. सैया आरती - अंतिम प्रार्थना के बाद सोने के लिए मां के बिस्तर तैयार करने से पहले की जाती है । यह मां के सोने की आरती   है ।

 यह आरती रात 9 बजे के आसपास शुरू होती है । इसमें दूध , मलाई और मौसमी फल मां ज्वाला देवी के लिए पेशकश की जाती है । भक्तगण मंगलवार और शुक्रवार को मुख्य रूप से पूजा के लिए यहां पहुंचते हैं । भारत के अन्य भागों से चैत्र अश्वनी नवरात्र और श्रावण महीने के समया लाखों में भक्त यहां पहुंचते हैं । 

(17) श्री त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ

(17) श्री  त्रिपुरमालिनी  शक्तिपीठ

 श्री  त्रिपुरमालिनी  शक्तिपीठ पंजाब के जालंधर शहर जो की एक खूबसूरत एवं अपने वस्त्र उत्पादों के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है । मां सती का मदिंर का निर्माण बहुत खूबसूरती के साथ किया गया है सामने सरोवर एवं एक विशाल आंगन है जो काले व सफेद संगमरमर से बना है तथा इस मंदिर का सुनहरा गुंबद बहुत प्रभावशाली है । 

कहते हैं कि यहां मां सती के बांए स्तन, गिर गया, कहा जाता है कि फिर बांए स्तन की गिरावट के स्थान पर इस मदिंर का निर्माण किया गया था । यहां मां सती की मूर्ति त्रिमालिनी के रूप में और भगवान शिव भीशन के रूप में पूजे जाते हैं । भगवान शिव का यह मदिंर ललीतेश्वर महादेव मंदिर कहा जाता है । 

त्यौहारों में दुर्गा पूजा काफी प्रसिद्ध है । नवरात्रि जो मार्च या अप्रैल में और दूसरी सितम्बर या अक्टूबर में आती है लोग उपवास रखते हैं एवं इन नौ दिनों में मिटटी से प्राप्त अनाज नहीं ग्रहण करते हैं । साथ ही लोग हर दिन फल, दूध, घर का बना प्रसाद, मिठाई देवी को भेंट कर प्रसाद ग्रहण करते हैं । 

Monday, 27 October 2014

(16) हिंगलाज शक्तिपीठ - पाकिस्तान में हिन्दू तीर्थ

(१६) हिंगलाज शक्तिपीठ - पाकिस्तान में हिन्दू तीर्थ

हिंगलाज शक्तिपीठ एक महत्वपूर्ण हिन्दू तीर्थस्थान बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में  स्थापित है भगवान शिव के तांडव के बाद सति को ले जाते समय सति का सिर (हिंगगुला) यहां पर गिर गया था   हिंगलाज माता की गुफा मंदिर एक संकीर्ण में स्थित है, बलूचिस्तान की लायरी तहसील जो कंरची से 250 कि.मी. है

एक छोटा सा निराकार पत्थर हिंगलाज माता के रूप मंे पूजा जाता है स्थानीय मुसलमान भी श्रद्धा के साथ हिंगलाज को नानी मंदिर के रूप में मानते हैं तथा उन्हें बीबी नानी कहा जाता है तीर्थयात्रा कोनानी की हजके रूप में मनाया जाता है   

Sunday, 26 October 2014

(15).हरसिद्धि मंदिर उज्जैन - शक्तिपीठ

.(15) हरसिद्धि मंदिर उज्जैन - शक्तिपीठ

हरसिद्धि मंदिर शक्ति पीठ के रूप में जाना जाता है । हरसिद्धि मंदिर उज्जैन के मंदिरों के शहर में एक महत्वपूर्ण मंदिर है । यह मंदिर देवी अन्नपूर्णा को समर्पित है जोे गहरे सिंदूरी रंग में रंगी है । देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति देवी महालक्ष्मी और देवी सरस्वती की मूर्तियों के बीच विराजमान है ।

श्रीयंत्र शक्ति की शक्ति का प्रतीक है और श्रीयंत्र भी इस मंदिर में प्रतिष्ठित है । पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शिव सती के शरीर को ले जा रहे थे, तब उसकी कोहनी इस जगह पर गिरी थी । मंदिर का पुनिर्माण मराठों ने किया अतः मराठी कला दीपकों से सजे हुए दो खंभों पर दिखाई देती है । 

मंदिर के शीर्ष पर एक सुन्दर कलात्मक स्तंभ है इस देवी को स्थानीय लोगों द्वारा बहुत शक्तिशाली माना जाता है । इस मंदिर के परिसर में एक प्राचीन कुँआ है । उज्जैन में हरसिद्धि मंदिर हिन्दू धर्म में शक्तिपीठ में से एक है और वास्तुकला का मराठा शैली का प्रतीक है । देवी के शरीर के अन्य भागों में गिर स्थानों पर जहां भारत में शक्तिपीठों के बाकी का गठन किया है । नवरात्रि पर 15 फुट ऊंचाई के दो दीप स्तंभों को प्रकाशवान किया जाता है । 

Monday, 20 October 2014

(14) गुहेश्वरी महामाया शक्तिपीठ

(14)  गुहेश्वरी महामाया शक्तिपीठ

गुहेश्वरी महामाया शक्तिपीठ नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर के पूर्व  में स्थित है यह शक्तिपीठ देवपाटन पर नदी बागमती के दक्षिण पश्चिम तट पर स्थित है । यहां मां सती के घुटने गिरे थे । यहां देवी महामाया और संस्कृत शब्द (गुप्त) और ईश्वरी (देवी) से व्युत्पन्न में गुहेश्वरी के रूप में भगवान शिव की रूप में पूजा जाता है । 

शब्द गुहारूपानी ( भगवान के रूप मानव धारणा से परे है और यह एक रहस्य है ) ललिता सहस्रनाम में बनाया है यह भी गुहेश्वी मंदिर माना जाता है । मंदिर नरसिंह ठाकुर, एक तांत्रिक की मदद से लिचावी अवधि के राजा शंकर देव के शासनकाल के दौरान निर्माण किय गया था । मंदिर बाद में लामबाकरना भटट, एक प्रख्यात की सलाह के साथ 1654 ईसवी में राजा प्रताप मल्ल द्वारा पुनर्निर्मित किया गया ।

 तांत्रिक संस्कार मंदिर में प्रदर्शन कर रहे हैं । मंदिर वास्तुकला भूटानी शिववालय शैली में बनाया प्रार्थना के दौरान प्रयोग की जाने वाले कई संगीत वाद्ययंत्र राजा राणा बहादुर द्वारा प्रस्तुत किए गए । मंदिर में मूर्तियों को सोने और चांदी के बने होेते हैं । त्यौहारों और मेलों का आयोजन नवरात्रि में होता है जिसमें नेपाल के राजा बागमती नदी में एक डुबकी लेता है और गुहेश्वरी मंदिर में देवी की पूजा करता है । 

ऐसा मानना है कि जो लोग इस मंदिर में शादी करते हैं तो सात जन्मों के आत्मा साथी बन जाता है । महिलाएं अपने पति के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करती हैं । इस मंदिर में पूजा दुश्मनों पर काबू पाने में मददगार है । गुहेश्वरी मेला नवंबर में आयोजित होता है ।

(13) माँ विश्वेश्वरी गोदावरी तिर शक्तिपीठ - राजमुंदरी

(13)  माँ विश्वेश्वरी गोदावरी तिर शक्तिपीठ - राजमुंदरी

गोदावरी तिर के रूप में प्रसिद्ध मंदिर जहां  मां सती के बाएं गाल गिरा और इस धार्मिक स्.थल पर पूजा की मूर्तियां विश्वेश्वरी या राकिनी या विश्व मातुका कहा जाता है । यह स्थान राजमुंदरी, आंध्रप्रदेश में गोदावरी नदी के तट पर कोटीलिंगेश्वर मंदिर में स्थित है । यह जगह शांति और सौंदर्य  के लिए सुरम्य दृश्य देता है । 

गोदावरी तिर शक्ति पीठ के गोदावरी नदी में श्री चैतन्य महाप्रभु और बालादेव प्रसिद्ध संतों ने स्नान किया । गोदावरी तिर मंदिर में साल में दो बार भक्ति समागम होते हैं एक नवरात्रि मार्च या अप्रैल में और अन्य सितम्बर या अक्टूबर के महीने में ।  नवरात्रि पूर्ण ऊर्जा, विश्वास, समर्पण और भक्ति के साथ मनाया जाता है । नवरा़ि़त्र में लोग उपवास रखते हैं और जमीन ने उगाया कोई भी अनाज फल नहीं खाते हैं ।

Sunday, 19 October 2014

(12) गंडकी शक्तिपीठ

(12) गंडकी शक्तिपीठ

गंडकी शक्ति पीठ गंडकी नदी नेपाल जो सबसे पवित्र नदी के तट पर बना है । अदृवतीय इस शक्तिपीठ, नदी में पाया गया कि शालीग्राम पत्थरों की उपस्थित है । इस नदी में डुबकी लेने से सभी पापों का नाश होता है । यहां पर सती का सही गाल गिर गया था । 

यहां मां सती की मूर्ति ‘‘ गंडकी ’’ के रूप में और भगवान शिव भगवान चक्रपानी के रूप में पूजे जाते हैं । गंडकी मंदिर के समारोह नवरात्रि मार्च/अप्रैल और सितम्बर/अक्टूबर में मनाये जाते हैं । नवरात्रि पूर्ण ऊर्जा, विश्वास, समर्पण और भक्ति भाव से मनायी जाती है । शिवरात्रि भी धूमधाम से एवं बहुत उत्साह से मनाते हैं ।

(11) माँ भद्रकाली देवीकूप मंदिर - शक्तिपीठ (थानेसर/कुरूक्षेत्र, हरियाणा)

(11) माँ भद्रकाली देवीकूप मंदिर -  शक्तिपीठ (थानेसर/कुरूक्षेत्र, हरियाणा)

काली माता / भद्रकाली शक्तिपीठ जहां माता सती के दाएं टखने में इस मंदिर के सामने एक कुंए में यहां गिर गया था । प्राचीन शक्ति पीठ भद्रकाली देवी काली के आठ रूपों में से एक है ।

कुरूक्षेत्र का शक्तिपीठ जहां श्रीकृष्ण का मुंडन हुआ था । हरियाणा का एक मात्र शक्तिपीठ कुरूक्षेत्र में है । यह शक्तिपीठ देवी कूप शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है । यँहा देवी सती का दायां टखना गिरा था । भद्रकाली माता के मंदिर में प्रवेश का मुख्य द्वार आसमान से बातें करता मंदिर का ऊंचा गुंबद जहां देवी का विजय पताका लहरा रहा है । 

भक्त दूर से ही इसके गुंबद को देखकर जयकारा लगाने लगते हैं । माता के मंदिर में भक्त बनकर कोई बदमाश नहीं आ जाए इसलिए पुलिसकर्मी लगे रहते हैं । सुरक्षा जांच में । नवरात्र के मौके पर सुरक्षा का विशेष प्रबंध किया जाता है । देवी कूप भद्रकाली माता के मंदिर का भव्य प्रांगण भक्त माता के दर्शनों के लिए पंक्ति में खड़े हैं , माता कब मिलेगा तेरा दिव्य दर्शन । 

नवरात्र के अवसर पर माता के मंदिर को फूलों से सजाया गया है । जिससे मंदिर की शोभा देखकर भक्त आंनद में झूमने लगते हैं । भगवान श्री कृष्ण का मुंडन यहां पर हुआ था । श्री कृष्ण ने माता को घोड़ा भेंट किया था । उस दिन से मनोकामना पूरी करने के लिए माता को घोड़ा भेंट किया जाता है ।